
इस दरवाजे के बाहर
सडक की तेज भागती ट्राफिक
कान चीरते हुए बजनेवाले हॉर्न
इतने वाहन मेरे शहर में पहले तो नहीं थे|
इधर उधर दाये बाए लोगही लोग
मुझे चलना हैं। … नहीं तेज भागना हैं
जीवन के आपाधापी में आगेही रहना हैं|
कोई अनजान, कोई जाने पहचाने चेहरे
हर कोई मेरी पाकिट मारनेवाला
या मेरे गलेकी चेन खींचनेवाला हों
ऐसा मेरा भयभीत मन|
मैं लपेटती हूँ मेरा पल्लू या दुपट्टा या जैकेट
खुदको छुपाने का प्रयास करती हूँ
धड़कन थोड़ी शांत करती हूँ |
उस दरवाजे के अंदर
ये हैं मेरा घर। मेरे अपने रहते हैं यहाँ,
किसीकी बेटी, बहन, भांजी थी कभी मैं
अब उसीके साथ पत्नी, माँ, बहु,भाभी भी हूँ |
घर के संस्कारोंके दायरे में रहती हूँ,
अपने कर्त्तव्य बखूबी निभाती हूँ
हरेक की अपेक्षाओंपे खरा उतरनेका प्रयास करती हूँ|
इस चार दीवारी में मैं चाहे जितना जी लूँ
यहाँ मेरे लिए प्यार हैं, अपनापन हैं, सम्मान हैं
सुरक्षितता हैं, थोड़ी बहुत सहूलियत भी हैं|
और इन दोनोंके दरमियाँ
है मुठ्ठीभर खुली हवा
थोड़ी सुनहरी धुप
थोड़ी शीतल छाँव
हरेभरे पत्ते
पेड़ की उलझी हुई शाखाएँ
बिलकुल वैसी जैसी मेरे मन की गुत्थियां
कभी कभी नीले आसमां का एक टुकड़ा भी नसीब होता है
लेकिन यहाँ मैं .. मैं हूँ ..सिर्फ मैं!
वृन्दा तिलक
१६/०२/२६
